garmi se main to aatish-e-gham ki pighal gaya | गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया

  - Meer Taqi Meer

गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
रातों को रोते रोते ही जों शम-ए-गुल गया

हम ख़स्ता-दिल हैं तुझ से भी नाज़ुक-मिज़ाज-तर
तेवरी चढ़ाई तू ने कि याँ जी निकल गया

गर्मी-ए-इश्क़ माने नश्व-ओ-नुमा हुई
मैं वो निहाल था कि उगा और जल गया

मस्ती में छोड़ दैर को का'बे चला था मैं
लग़्ज़िश बड़ी हुई थी व-लेकिन सँभल गया

साक़ी नशे में तुझ से लुंढा शीशा-ए-शराब
चल अब कि दुख़्त-ए-ताक का जोबन तो ढल गया

हर ज़र्रा ख़ाक तेरी गली की है बे-क़रार
याँ कौन सा सितम-ज़दा माटी में रुल गया

उर्यां तनी की शोख़ी से दीवानगी में 'मीर'
मजनूँ के दश्त-ए-ख़ार का दामाँ भी चल गया

  - Meer Taqi Meer

Gaon Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Meer Taqi Meer

As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer

Similar Writers

our suggestion based on Meer Taqi Meer

Similar Moods

As you were reading Gaon Shayari Shayari