जफ़ाएँ देख लियाँ बेवफ़ाइयाँ देखीं

भला हुआ कि तिरी सब बुराइयाँ देखीं

तिरी गली से सदा ऐ कशंदा-ए-आलम
हज़ारों आती हुई चारपाइयाँ देखीं

गया नज़र से जो वो गर्म तिफ़्ल-ए-आतिश-बाज़
हम अपने चेहरे पे उड़ती हवाइयाँ देखीं

तिरे विसाल के हम शौक़ में हों आवारा
अज़ीज़ दोस्त सभों की जुदाइयाँ देखीं

हमेशा माइल-ए-आईना ही तुझे पाया
जो देखीं हम ने यही ख़ुद-नुमाईयाँ देखीं

शहाँ कि कोहल-ए-जवाहर थी ख़ाक-ए-पा जिन की
उन्हीं की आँखों में फिरते सलाइयाँ देखीं

बनी न अपनी तो उस जंग-जू से हरगिज़ 'मीर'
लड़ाईं जब से हम आँखें लड़ाइयाँ देखीं

— Meer Taqi Meer

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