lakht-e-jigar to apne yak-lakht ro chuka tha | लख़्त-ए-जिगर तो अपने यक-लख़्त रो चुका था

  - Meer Taqi Meer

लख़्त-ए-जिगर तो अपने यक-लख़्त रो चुका था
अश्क-ए-फ़क़त का झमका आँखों से लग रहा था

दामन में आज देखा फिर लख़्त मैं ले आया
टुकड़ा कोई जिगर का पलकों में रह गया था

उस क़ैद-ए-जेब से मैं छोटा जुनूँ की दौलत
वर्ना गला ये मेरा जूँ तौक़ में फँसा था

मुश्त-ए-नमक की ख़ातिर इस वास्ते हूँ हैराँ
कल ज़ख़्म-ए-दिल निहायत दिल को मिरे लगा था

ऐ गर्द-बाद मत दे हर आन अर्ज़-ए-वहशत
मैं भी कसू ज़माने इस काम में बला था

बिन कुछ कहे सुना है आलम से मैं ने क्या क्या
पर तू ने यूँँ न जाना ऐ बेवफ़ा कि क्या था

रोती है शम्अ' इतना हर शब कि कुछ न पूछो
मैं सोज़-ए-दिल को अपने मज्लिस में क्यूँँ कहा था

शब ज़ख़्म-ए-सीना ऊपर छिड़का था मैं नमक को
नासूर तो कहाँ था ज़ालिम बड़ा मज़ा था

सर मार कर हुआ था मैं ख़ाक उस गली में
सीने पे मुझ को उस का मज़कूर नक़्श-ए-पा था

सो बख़्त-ए-तीरा से हूँ पामाली-ए-सबा में
उस दिन के वास्ते मैं क्या ख़ाक में मिला था

ये सर-गुज़श्त मेरी अफ़्साना जो हुई है
मज़कूर उस का उस के कूचे में जा-ब-जा था

सुन कर किसी से वो भी कहने लगा था कुछ कुछ
बे-दर्द कितने बोले हाँ उस को क्या हुआ था

कहने लगा कि जाने मेरी बला अज़ीज़ाँ
अहवाल था किसी का कुछ मैं भी सुन लिया था

आँखें मिरी खुलीं जब जी 'मीर' का गया तब
देखे से उस को वर्ना मेरा भी जी जला था

  - Meer Taqi Meer

Poverty Shayari

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