naala-e-izz naqs-e-ulfat hai | नाला-ए-इज्ज़ नक़्स-ए-उलफ़त है

  - Meer Taqi Meer

नाला-ए-इज्ज़ नक़्स-ए-उलफ़त है
रंज-ओ-मेहनत कमाल राहत है
'इश्क़ ही गिर्या-ए-नदामत है
वर्ना आशिक़ को चश्म-ए-ख़िफ़्फ़त है

ता दम-ए-मर्ग ग़म ख़ुशी का नहीं
दिल-ए-आज़ुर्दा गर सलामत है

दिल में नासूर फिर जिधर चाहे
हर तरफ़ कूचा-ए-जर्राहत है

रोना आता है दम-ब-दम शायद
कसो हसरत की दिल से रुख़्सत है

फ़ित्ने रहते हैं उस के साए में
क़द-ओ-क़ामत तिरा क़यामत है

न तुझे रहम ने उसे टुक सब्र
दिल पे मेरे 'अजब मुसीबत है

तू तो नादान है निपट नासेह
कब मोअस्सिर तिरी नसीहत है

दिल पे जब मेरे आ के ये ठहरा
कि मुझे ख़ुश-दिली अज़िय्यत है

रंज-ओ-मेहनत से बाज़ क्यूँँके रहूँ
वक़्त जाता रहे तो हसरत है

क्या है फिर कोई दम को क्या जानो
दम ग़नीमत मियाँ जो फ़ुर्सत है

तेरा शिकवा मुझे न मेरा तुझे
चाहिए यूँँ जो फ़िल-हक़ीक़त है

तुझ को मस्जिद है मुझ को मय-ख़ाना
वाइज़ा अपनी अपनी क़िस्मत है

ऐसे हँसमुख को शम्अ' से तश्बीह
शम्अ-ए-मज्लिस की रोनी सूरत है

बातिल-उस-सेहर देख बातिल थे
तेरी आँखों का सेहर आफ़त है

अब्र-ए-तर के हुज़ूर फूट बहा
दीदा-ए-तर को मेरे रहमत है

गाह नालाँ तपाँ गहे बे-दम
दिल की मेरे 'अजब ही हालत है

क्या हुआ गर ग़ज़ल क़सीदा हुई
आक़िबत क़िस्सा-ए-मोहब्बत है

तुर्बत-ए-'मीर' पर हैं अहल-ए-सुख़न
हर तरफ़ हर्फ़ है हिकायत है

तू भी तक़रीब-ए-फ़ातिहा से चल
ब-ख़ुदा वाजिबु्ज़्ज़ियारत है

  - Meer Taqi Meer

Berozgari Shayari

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