शहरस यार सवार हुआ जो सवाद में ख़ूब ग़ुबार है आज
दश्ती वहश ओ तैर उस के सर तेज़ी ही में शिकार है आज
बरफ़रोख़्ता रुख़ है उस का किस ख़ूबी से मस्ती में
पी के शराब शगुफ़्ता हुआ है उस नौ-गुल पे बहार है आज
उस का बहर-ए-हुस्न सरासर औज ओ मौज ओ तलातुम है
शौक़ की अपने निगाह जहाँ तक जावे बोस-ओ-कनार है आज
आँखें उस की लाल हुईं हैं और चले जाते हैं सर
रात को दारू पी सोया था उस का सुब्ह ख़ुमार है आज
घर आए हो फ़क़ीरों के तो आओ बैठो लुत्फ़ करो
क्या है जान बिन अपने कने सो इन क़दमों पे निसार है आज
क्या पूछो हो साँझ तलक पहलू में क्या क्या तड़पा है
कल की निस्बत दिल को हमारे बारे कुछ तो क़रार है आज
ख़ूब जो आँखें खोल के देखा शाख़-ए-गुल सा नज़र आया
उन रंगों फूलों में मिला कुछ महव-ए-जल्वा-ए-यार है आज
जज़्ब-ए-इश्क़ जिधर चाहे ले जाए है महमिल लैला का
यानी हाथ में मजनूँ के नाक़े की उस के महार है आज
रात का पहना हार जो अब तक दिन को उतारा उन ने नहीं
शायद 'मीर' जमाल-ए-गुल भी उस के गले का हार है आज
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer
our suggestion based on Meer Taqi Meer
As you were reading Bhai Shayari Shayari