"रो तो रहे हैं"

नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं
ग़म तुझ से कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं
सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर
नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं

कहें क्या किसी से दर्द अपना
छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना
तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं
कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना

ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई
ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई

वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं
आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं
इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी
वजह न सही, यूँ ही सही, रो तो रहे हैं

मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है
जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है
ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँ तो
और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है

आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष'
काम तो दिल ही कर सारा देता है
भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर
टपकना आँसुओं का सहारा देता है

पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं
करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं

ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं
कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं
इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं
सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं

— Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

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