aap ki aankh se gahra hai mirii rooh ka zakham | आप की आँख से गहरा है मिरी रूह का ज़ख़्म

  - Mohsin Naqvi

आप की आँख से गहरा है मिरी रूह का ज़ख़्म
आप क्या सोच सकेंगे मिरी तन्हाई को

मैं तो दम तोड़ रहा था मगर अफ़्सुर्दा हयात
ख़ुद चली आई मिरी हौसला-अफ़ज़ाई को

लज़्ज़त-ए-ग़म के सिवा तेरी निगाहों के बग़ैर
कौन समझा है मिरे ज़ख़्म की गहराई को

मैं बढ़ाऊँगा तिरी शोहरत-ए-ख़ुश्बू का निखार
तू दुआ दे मिरे अफ़्साना-ए-रुसवाई को

वो तो यूँँ कहिए कि इक क़ौस-ए-क़ुज़ह फैल गई
वर्ना मैं भूल गया था तिरी अंगड़ाई को

  - Mohsin Naqvi

Ibaadat Shayari

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