इस क़दर आपसे फ़ासला रह गया
उन से क्या क्या कहें सोचता रह गया
हर दिए को मुयस्सर नहीं रौशनी
रात भर एक जुगनू जला रह गया
मैं ने रस्में-निशानी में दिल दे दिया
और वो था के बस बे-वफ़ा रह गया
रात भर तिश्नगी में तड़पते रहे
चाँद पहलू में फिर से खड़ा रह गया
लौट कर उस ने मुझ को पुकारा नहीं
फिर लबों पे वो क्या कांपता रह गया
उस गुलिस्ताँ ने दुनिया बसा ली मगर
ये शज़र आज फिर वादिया रह गया
तीरगी को न दिल से मिटा पाए तुम
दिल हमारा महज़ आईना रह गया
पास दरिया से गुज़रे मुसाफिर कई
एक मैं था के बस देखता रह गया
— Puneet Mishra Akshat















