makaan hote kya kisi ki beghari ko dekhna | मकान होते क्या किसी की बेघरी को देखना

  - Nadir Ariz

मकान होते क्या किसी की बेघरी को देखना
कभी मिरी जगह पे आके ज़िन्दगी को देखना

हुजूम से निगाह फेर लेंगे तुझको देखकर
हमारा मसअला नहीं है हर किसी को देखना

किसी ने तेरी बात छेड़ी और शब गुज़र गई
किसी को याद ही नहीं रहा घड़ी को देखना

उमीद रखना तुझ सेे प्यार की कुछ ऐसी बात है
परिन्दा छोड़ना फिर उसकी वापसी को देखना

यहाँ पे कौन-कौन जागता है आधी रात तक
हमारा खिड़कियों से लग के रौशनी को देखना

  - Nadir Ariz

Raat Shayari

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