प्यार करता हूँ मगर उस को बताता नहीं मैं

एक मिसरा है गिरह जिस पे लगाता नहीं मैं

तुझ से बिछड़ा तो मुहब्बत यहीं रह जाएगी
घर पलटते हुए सामान उठाता नहीं मैं

उस के साथ आँख मिचौली का मज़ा आता है
फूल देता हूँ उसे सामने आता नहीं मैं

जल्द उस बाग़ की तरतीब बदल जाएगी
एक मंज़र को लगातार दिखाता नहीं मैं

ख़्वाब देखा है कि तुम डूबके मरने लगे हो
और खड़ा देखता रहता हूँ बचाता नहीं मैं

रोज़ इस तरह मुलाक़ात तो हो जाती है
इस लिए दोस्त तिरा क़र्ज़ चुकाता नहीं मैं

— Nadir Ariz

More by Nadir Ariz

Other ghazal from the same pen

See all from Nadir Ariz →

Masti Shayari

Shers of masti.

All Masti Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling