ना कोई मरा न किसी की साँसें निकलीं
सब की सब बेमतलब की बातें निकलीं
लिक्खे शब्दों पे क़ाएम हैं ये आज भी
तुम सेे अच्छी तो यार किताबें निकलीं
तूने जिन जिन पौधों को पानी दिया है
वो न बड़े हो पाए ना शाखें निकलीं
पहले आँसू निकले फिर ग़म भी, यानी
इक ही घर से दो दो बारातें निकलीं
बाद गले लगने के पूरे बीस मिनट
उसकी बाहों से मेरी बाहें निकलीं
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Nirvesh Navodayan
our suggestion based on Nirvesh Navodayan
As you were reading Shama Shayari Shayari