ना कोई मरा न किसी की साँसें निकलीं
सब की सब बे-मतलब की बातें निकलीं
लिक्खे शब्दों पे क़ाएम हैं ये आज भी
तुम से अच्छी तो यार किताबें निकलीं
तू ने जिन जिन पौधों को पानी दिया है
वो न बड़े हो पाए ना शाखें निकलीं
पहले आँसू निकले फिर ग़म भी, या'नी
इक ही घर से दो दो बारातें निकलीं
बा'द गले लगने के पूरे बीस मिनट
उस की बाहों से मेरी बाहें निकलीं
— Nirvesh Navodayan















