जो बाहरस हमें लगता हरा हैवो भीतर पूरा ही विष से भरा हैन जाने क्यूँ चराग़ों को गुमाँ हैहवाएँ उन को देती आसरा हैचला है वो ज़माना बस में करनेमगर लगता है वो ख़ुद से डरा हैगला अपना बचा के रखना यारोंलगा बन्दर के हाथों उस्तरा हैलड़ाई जाने कब उन की रुकेगीजहाँ सनकी के आगे मसख़रा है— Nitin Upadhye