अज़िय्यत में ये शब गुज़ारे न होते
अगर हम मुहब्बत में हारे न होते
वहाँ चाँद भी यार तन्हा ही होता
अगर आसमाँ में सितारे न होते
मुझे बेवफ़ा ही कहा जाता गर हम
बदन से वसन जब उतारे न होते
कहीं दूर जाकर भटकता मैं रहता
मधुरता से तुम गर पुकारे न होते
नहीं शौक़ रहता, तुम्हें ग़ज़लें पढ़ना
तो फिर हम कभी भी तुम्हारे न होते
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