एक ख़त

ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है
अंजाम-ए-शौक़ के नाम एक ख़त आया है

जिस राह पे चले थे उस रहगुज़ार का ख़त
कि रूप बना दे मिटा दे उस रूप-कार का ख़त
माज़ी की स्याही से निकला उल्फ़त का ख़त
आस-ए-जवाब में भेजा ये चाहत का ख़त

अर्ज़-ए-वफ़ाओं पे आए ए’तिबार का ख़त
ये इंतिख़ाब-ए-फ़ुर्क़त पे सोगवार का ख़त
मिला है बाद-ए-सबा में घुली अज़ीयत का ख़त
उदास करता ये बारहा तबीअ'त का ख़त

हर हर्फ़ में झलकती हुई इनायत का ख़त
छुपी अक़ीदत का ख़त जगी हक़ीक़त का ख़त
ये कानों को छूते मद्धम पुकार का ख़त
है अश्कों को बुलाता ये अश्क-बार का ख़त

कि अब्र फूटे हैं जज़्बातों के जिस ख़त में
ऐ दिल सुनो कि उस ख़त से अब नज़र न फेरो
देखो इन बोझल आँखों से गिरें ये मोती
कहीं लिखे इन हर्फ़ों को काग़ज़ पे बहा न दें
यूँ बैठे हो रोज़-ए-फ़िराक़ से जिस हरारत में
अब उस की आग ख़्वाह-म-ख़्वाह तुम को जला न दे

छोड़ो अब अदावत की ज़िद अपनी और आओ
ऐ दिल आओ पढ़ लें कि एक ख़त आया है

— Prakash Pandey

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