इस क़दर भा गई है इश्क़ में तन्हाई हमें
तेरी बाहों में भी फिर नींद नहीं आई हमें
जब से सूखे हैं निगाहों से हमारे आँसू
तोड़ पाई है कहाँ कोई भी रुसवाई हमें
दे गई फिर से नए ज़ख़्म बड़ी शिद्दत से
ग़ैर की बाहों में लिपटी तेरी परछाई हमें
डूबते वक़्त किसी को न पुकारा हम ने
देखते रह गए साहिल के तमाशाई हमें
छोड़ के जा तू हमें और पता चलने दे
कौन से मरहले पे ले गई बरनाई हमें
डूबने पर ही तो मालूम हुई है जानाँ
तेरी हँसती हुई आँखों की ये गहराई हमें
रास्ते क़ीमती भी होते हैं आख़िर ये बात
आज मंज़िल पे पहुँच कर ही समझ आई हमें
— Pravendra Anuragi















