गुलों को चूम कर आई सबा सी लगती थी

थी इक नज़र पे मोअ'त्तर हवा सी लगती थी

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म था लेकिन गुलाब हाथों में
बड़ी थी चोट तो लेकिन ज़रा सी लगती थी

वो तुर्श-गो लब-ए-जाँ-बख़्श भी था क्या कहिए
कि तल्ख़ बात भी उस की दवा सी लगती थी

सितम को हुस्न-ए-सितम कर गया वही वर्ना
यही थी ज़िंदगी लेकिन सज़ा सी लगती थी

मिरी तड़प को समझता था इक इबादत वो
मुझे भी उस की मोहब्बत दुआ सी लगती थी

चलो वो आँख में पानी तो दे गया वर्ना
ये साँस अंधे कुएँ में सदा सी लगती थी

— R P Shokh

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Zulm Shayari

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