कभी मंज़िल कभी रस्ता लगेगा

नहीं मानोगे तो सदमा लगेगा

तेरे दर पर तेरी ख़ातिर बता ना
हमें रोना पड़े अच्छा लगेगा

कहानी अब सुनो संज़ीदगी से
ग़ज़ल छोड़ो यहाँ भद्दा लगेगा

लबों से चूम कर जो तुम खिला दो
वही बिस्किट हमें खस्ता लगेगा

चले आए टपोरी क्लास करने
नहीं मालूम था बस्ता लगेगा

बहुत महँगा पड़ा है हिज्र हम को
बहुत लोगों को ये सस्ता लगेगा

ज़बरदस्ती नहीं है यार लेकिन
चले आओ बड़ा अच्छा लगेगा

कहानी से हमें बर्ख़ास्त कर दो
वही किरदार बस सच्चा लगेगा

— Atul K Rai

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