दो निगाहें हैं एक साज़िश है

इश्क़ भी कैसी आज़माइश है

ख़ुद को खो दूँ मैं तुम को पा लूँ बस
एक ही ख़्वाब एक ख़्वाहिश है

जल रहा है चराग़ पलकों पर
तेज़ झोंकों की ये नवाज़िश है

अश्क आँखों से गिरते रहते हैं
हिज्र की मुस्तक़िल ये बारिश है

ज़ख़्म दिल के गुलाब जैसे हैं
याद की ये पुरानी रंजिश है

लब पे ख़ामोशियाँ ये नम आँखें
ये मोहब्बत की इक परस्तिश है

भूल जाना न 'सारथी' को तुम
बस यही आख़िरी गुज़ारिश है

— Saarthi Baidyanath

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