क्या कहा मैं मुस्कुराना छोड़ दूँ
उस गली में आना-जाना छोड़ दूँ
एक ही तो मश्ग़ला है अब मेरा
क्या मैं अब दिल को लगाना छोड़ दूँ
ज़िक्र ही उसका है मेरी ज़ीस्त अब
क्या मैं उस का ही फ़साना छोड़ दूँ
उस की आँखों में ठिकाना मिल गया
क्या मैं अपना आशियाना छोड़ दूँ
मिट ही जाएगी ये हस्ती 'सारथी'
क्या मैं तर्ज़-ए-आशिक़ाना छोड़ दूँ
— Saarthi Baidyanath















