दर्द अपना सब गिरा के जाते हैं
दर पे तेरे लोग जितने आते हैं
हम बने बेज़ार बंजारे यहाँ
अब कभी धोके कभी ग़म पाते हैं
कितनी कंगाली है छाई इश्क़ की
कुछ वफ़ा वाले भी सिक्के लाते हैं
ज़िंदगी बे-रंग तख़्ती लगती है
इस लिए ग़म के तराने गाते हैं
गुम-शुदा हों जब लकीरें हाथ की
क्या वो फिर भी बंदों को अपनाते हैं
इश्क़ से क्या पेट क्या घर ही चले
मेरे अपने तो यही समझाते हैं
इन हवाओं को मिली जानिब 'अनुज'
बाल जब जब तेरे ये लहराते हैं
— sahllucknowi















