vo paas rah ke bhi mujh men samaa nahin saka | वो पास रह के भी मुझ में समा नहीं सकता

  - Salman Akhtar

वो पास रह के भी मुझ में समा नहीं सकता
वो मुद्दतों न मिले दूर जा नहीं सकता

वो एक याद जो दिल से मिटी नहीं अब तक
वो एक नाम जो होंटों पे आ नहीं सकता

वो इक हँसी जो खनकती है अब भी कानों में
वो इक लतीफ़ा जो अब याद आ नहीं सकता

वो एक ख़्वाब जो फिर लौट कर नहीं आया
वो इक ख़याल जिसे मैं भुला नहीं सकता

वो एक शे'र जो मैं ने कहा नहीं अब तक
वो एक राज़ जिसे मैं छुपा नहीं सकता

  - Salman Akhtar

Raaz Shayari

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