ज़वाल से भी भला कौन ही उभरता है
मिली है जिस को हिदायत वही सुधरता है
शिकस्त होती है उस को नसीब दुनिया में
हदों को जो भी यहाँ अपनी पार करता है
यक़ीन हम को नहीं आएगा कभी उस पर
जो अपने वादे से हर बार ही मुकरता है
मोहब्बतों में तो दिल हारना ही लाज़िम था
मोहब्बतों में ख़सारे से कौन डरता है
इसीलिए तो जलाया है अपना दिल मैं ने
कि सोना आग में तप तप के ही निखरता है
हँसी ख़ुशी से गुज़रती है ज़िंदगी सबकी
जुदाई में न कोई अब किसी की मरता है
अदब का ऐसा चढ़ा है नशा हमारे सर
ख़ुमार इस का उतारे नहीं उतरता है
अज़ीज़-तर है सना दिल वही निगाहों में
ख़ुदा के सामने जो टूट कर बिखरता है
— Sana Hashmi














