लूट ली मुस्कान उसकी मुफ़लिसी ने सस्ते में
अब किताबों की जगह कुछ बोलते हैं बस्ते में
रोज़ चलकर रस्सी पर करतब दिखाने पड़ते हैं
जब से शामिल है हुआ वो मुफ़लिसी के दस्ते में
सर पे उसके छत नहीं है और तन पर पैरहन
बीनकर कचरा उदर भरता, है सोता रस्ते में
जब से जन्मा हाथ उसके बस निराशा ही लगी
दुगुने दुख और दर्द मिलते बस उसे गुलदस्ते में
बेबसी ने जब से याँ ख़ामोश उसको है किया
तब से उसकी गिनती भी होने लगी लब-बस्ते में
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