vo din bhi the ki in aankhoñ men itni hairat thii | वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी

  - Shariq Kaifi

वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी
तमाम बाज़ीगरों को मिरी ज़रूरत थी

वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता
बिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी

पता नहीं ये तमन्ना-ए-क़ुर्ब कब जागी
मुझे तो सिर्फ़ उसे सोचने की आदत थी

ख़मोशियों ने परेशाँ किया तो होगा मगर
पुकारने की यही सिर्फ़ एक सूरत थी

गए भी जान से और कोई मुतमइन न हुआ
कि फिर दिफ़ाअ न करने की हम पे तोहमत थी

कहीं पे चूक रहे हैं ये आईने शायद
नहीं तो अक्स में अब तक मिरी शबाहत थी

  - Shariq Kaifi

Udas Shayari

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