तीर ए चश्म को दिल के आरपार करती है
इक हसीना है जो निगाहों से वार करती है
है निगाहों में शोखी, अदाओं में जादू
वो ज़िंदादिल हर लम्हे से प्यार करती है
क्या खूब गुज़रा था उस संग हर एक लम्हा
उस के बा'द की तन्हाई मुझे बेज़ार करती है
कोशिश जब भी करता हूँ उस से दूर जाने की
वो अपने पास आने को इशारे हजार करती है
उस के लबों की ख़ामोशी को ग़ौर से पढ़ा है मैं ने
मैं जानता हूँ वो अब भी मोहब्बत बेशुमार करती है
ख़ुद को लुटा दूँ उस की ख़ुशियों की ख़ातिर "निहार"
जो वो कह दे कि अब भी मुझ से प्यार करती है
— Shashank Tripathi















