दिल किसी नूर से मुनव्वर था
जब तलक 'इश्क़ मेरे अंदर था
मौसम-ए-वस्ल में ये मायूसी
यार इस सेे तो हिज्र बेहतर था
रात कहता है दूधिया नज़्में
चाँद दिन में उदास शायर था
दीन पूछो तो हँसने लगता था
गाँव में मेरे इक कलंदर था
वो जहाँ हौसले ने दम तोड़ा
बस उसी मोड़ पे मुक़द्दर था
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