यार अब कैसे कहूँ कैसे हुआ बर्बाद मैं
रोज़ करता था नए ग़म को यहाँ ईजाद मैं
पहले लगता था बहुत ही ख़ास हूँ सबके लिए
अब तो लगता है किसी को भी नहीं हूँ याद मैं
उलझनें तो हैं मगर इस
में मज़ा कम भी नहीं
कैद हूँ ख़ुद में ज़माने से हुआ आज़ाद मैं
ज़िंदगी भर ज़िंदगी को मैं लिखूँ खाई क़सम
और इक दिन बन गया अपने लिए इरशाद मैं
मुश्किलें होंगी यहाँ कमज़ोर जाँ हम भी नहीं
फिर नई सी शाख़ सा हो जाऊँगा आबाद मैं
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