मुकम्मल एक दुनिया चाहती थी
किसी से रोज़ ख़ुशियाँ माँगती थी
ज़माना पूछता था हाल मेरा
मैं हरदम बात को बस टालती थी
ख़ुदा से माँग रक्खा था उसे सो
ख़ुदा के बा'द उस को मानती थी
उसे मालूम होता ही नहीं था
मगर मैं हाल उस का जानती थी
नहीं आता है कोई लौट के फिर
भला मैं क्यूँ गली में झाँकती थी
नहीं समझा मेरी उस बात को वो
जो आँखों से बताना चाहती थी
— Shubhangi Bharti















