जैसे ख़ुद ही पेड़ गिरा हो आरे पर
हम से क़ाबू हुआ न अपने ग़ुस्से पर
मैं हूँ जो हूँ ख़ाली पड़ा हूँ कमरे में
बरतन है जो ख़ाली पड़े हैं चूल्हे पर
ख़ुद को देख के ख़ुद से ही शर्माता है
वो जो ख़ुद ही मरा पड़ा है आइने पर
तेरा हो कर और किसी को देखे वो
लानत है फिर मुझ को ऐसे बंदे पर
वो जिन जिन को देख के हॅंसती होती थी
आज गली में बैठे हैं सब धरने पर
— Simar Gozra















