कई दरिया उतर कर आ रहा हूँ
मगर लगता है मैं कितना नया हूँ
किसी के रोके से रुकता नहीं हूँ
कभी तो लगता है मैं ही ख़ुदा हूँ
गवाही दे अगर दिल तो आ जाना
अभी तक सीट पर बैठा हुआ हूँ
तू अपनी बात पूरी कर मैं तब तक
अधूरा जाम पूरा कर रहा हूँ
पहुँच कर रब तलक मुझ तक न पहुँची
मैं ऐसे ना-तवाँ दिल की दुआ हूँ
यहाँ मेरे मुताबिक़ हो रहा सब
मैं ही दरिया किनारा नाख़ुदा हूँ
इसी बाइस मुझे हासिल है मंज़िल
सफ़र में दम-ब-दम चलता रहा हूँ
खरोंचें ज़ख़्म बनती जा रहीं अब
मैं पहले से ही सोहिल अध-जला हूँ
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sohil Barelvi
our suggestion based on Sohil Barelvi
As you were reading Maikashi Shayari Shayari