कई ज़ख़्मों की रोज़ी चल रही है
हमारी आँख में इतनी नमी है
किसी सूरत मिला रब तो कहूँगा
मिरी तक़दीर क्यूँँ ऐसी लिखी है
तिरे होने से है क़ाइम तबस्सुम
अगर तू ही नहीं तो क्या ख़ुशी है
यहाँ तन्हाई का इतना असर है
मिरी आवाज़ भी अब दब गई है
किसी पर कर नहीं सकता मैं ज़ाहिर
वही इक बात जो दिल पर लगी है
यहीं रह जाएगा रक्खा हुआ सब
बरा-ए-नाम की ये ज़िंदगी है
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