is ka gham hai ki mujhe vaham hua hai shaayad | इस का ग़म है कि मुझे वहम हुआ है शायद

  - Subhan Asad

इस का ग़म है कि मुझे वहम हुआ है शायद
कोई पहलू में मिरे जाग रहा है शायद

जागते जागते पिछली कई रातें गुज़री
चाँद होना मिरी क़िस्मत में लिखा है शायद

दौड़ जाऊँ हर इक आहट पे किवाड़ों की तरफ़
और फिर ख़ुद को ही समझाऊँ हवा है शायद

उस की बातों से वो अब फूल नहीं झड़ते हैं
उस के होंटों पे अभी मेरा गिला है शायद

उस को खोलूँ तो रग-ए-दिल को कोई डसता है
याद की गठरी में इक साँप छुपा है शायद

मुझ को हर राह उजालों से भरी मिलती है
ये उन आँखों के चराग़ों की दुआ है शायद

  - Subhan Asad

Basant Shayari

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