इस सफ़र में एक दम ही आम है तू ज़िंदगी
कुछ नहीं है बस मेरी ग़ुलाम है तू ज़िंदगी
आदमी के हिस्से में यहाँ पे आता कुछ नहीं
सिर्फ़ इक बहुत बड़ा सा नाम है तू ज़िंदगी
जानकार तेरे बारे में यही बताते हैं कि
चिलचिलाती दोपहर की शाम है तू ज़िंदगी
पूछते ही रह गए तेरा पता हयात हम
जो मिला नहीं वो इक मक़ाम है तू ज़िंदगी
तेरी आँखों की नमी थी मेरे नाम किंतु अब
कोई और पी गया वो जाम है तू ज़िंदगी
चुप हो जाते हैं बड़े बड़े भी तेरे सामने
सरकशी ज़बान पे लगाम है तू ज़िंदगी
बीस साल जी के ये ख़याल है तेरे लिए
ख़ुद-कुशी से भी कहीं हराम है तू ज़िंदगी
— Subhash Ehsaas















