मुझे वो ज़ख़्म देके जा रहे हैं
मिरे नाख़ून बढ़ते जा रहे हैं
शिकायत कौन करता रब से उसकी
सभी उसके ही होते जा रहे हैं
हमारा कौन है जो सोचे हमको
सो हम तुमको ही सोंचे जा रहे हैं
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में है
यही इक ख़्वाब देखे जा रहे हैं
नदी को पार करके आ गए हम
तिरी आँखों में डूबे जा रहे हैं
यहाँ जितने तुम्हारे साथ में हैं
सभी हमको ही घूरे जा रहे हैं
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