मुझे वो ज़ख़्म दे के जा रहे हैं
मिरे नाख़ून बढ़ते जा रहे हैं
शिकायत कौन करता रब से उस की
सभी उस के ही होते जा रहे हैं
हमारा कौन है जो सोचे हम को
सो हम तुम को ही सोंचे जा रहे हैं
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में है
यही इक ख़्वाब देखे जा रहे हैं
नदी को पार कर के आ गए हम
तिरी आँखों में डूबे जा रहे हैं
यहाँ जितने तुम्हारे साथ में हैं
सभी हम को ही घूरे जा रहे हैं
— Surya Tiwari















