हो के बीमार से निकलते हैं

दिल के बाज़ार से निकलते हैं

मेरा दुख जानते हैं अच्छे से
अश्क दीवार से निकलते हैं

जो कभी लौट कर नहीं आते
वो बड़े प्यार से निकलते हैं

लोग जाते हैं छोड़ कर दुनिया
या'नी किरदार से निकलते हैं

जो सुखन से इलाज करते हैं
तेरे दरबार से निकलते हैं

उस की पाकीज़गी पे शक न करें
फूल जो खार से निकलते हैं

टूटा दिल अपना ले के हाथों में
कूचा-ए-यार से निकलते हैं

आता है इक हुजूम देखने को
हम भी जब कार से निकलते हैं

तेरी गलियों में घूमते लड़के
तेरी दरकार से निकलते हैं

— Tarique Jamal

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