zehan par zor dene se bhi yaad nahin aata ki ham kya dekhte the | ज़ेहन पर ज़ोर देने से भी याद नहीं आता कि हम क्या देखते थे

  - Tehzeeb Hafi

ज़ेहन पर ज़ोर देने से भी याद नहीं आता कि हम क्या देखते थे
सिर्फ़ इतना पता है कि हम आम लोगों से बिल्कुल जुदा देखते थे

तब हमें अपने पुरखों से विरसे में आई हुई बद्दुआ याद आई
जब कभी अपनी आँखों के आगे तुझे शहर जाता हुआ देखते थे

सच बताएँ तो तेरी मोहब्बत ने ख़ुद पर तवज्जो दिलाई हमारी
तू हमें चूमता था तो घर जा के हम देर तक आईना देखते थे

सारा दिन रेत के घर बनाते हुए और गिरते हुए बीत जाता
शाम होते ही हम दूरबीनों में अपनी छतों से ख़ुदा देखते थे

उस लड़ाई में दोनों तरफ़ कुछ सिपाही थे जो नींद में बोलते थे
जंग टलती नहीं थी सिरों से मगर ख़्वाब में फ़ाख्ता देखते थे

दोस्त किसको पता है कि वक़्त उसकी आँखों से फिर किस तरह पेश आया
हम इकट्ठे थे हँसते​ थे रोते थे इक दूसरे को बड़ा दखते थे

  - Tehzeeb Hafi

Fasad Shayari

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