RAAHI
RAAHI
Ghazal

जिस्म हो या हो भरोसा सब बिका है

कौन मजबूरी बताता सब बिका है

दाम सबका लग रहा है एक जैसा
इक अकेला या ज़माना सब बिका है

कब तलक रोके रहूँ मैं आबरू को
कल भरी महफ़िल लुटाया सब बिका है

बन गया धंधा यहाँ सब छीनने का
है सभी का सब छिनाया सब बिका है

है ज़रा सी बात पर कोई नहीं दोस्त
हाँ बिका तू तो अलग सा सब बिका है

— RAAHI

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