“मिट्टी”
मिट्टी मेरी तेरी ख़ुशबू
तुझ से हम हैं तू ही हर सू
जिस्म बना है ये तुझ से ही
मिल जाएँगे हम तुझ में ही
तुझ
में खेलेंकूदें गाएँ
बच्चे तुझ
में ही सो जाएँ
मिट्टी कुछ तो बोल ज़रा तू
कितनी है अनमोल धरा तू
तुझ से फूटे बीज नए जब
बनते हैं मज़बूत शजर तब
तू ज़रख़ैज़ कभी है बंजर
है पोशीदा कितने मंज़र
नाज़ करें क्यूँ अहल-ए-दुनिया
ये तो है मिट्टी की गुड़िया
पेशानी पर इस का टीका
रंग नहीं है इस का फीका
सोना चाँदी हीरा मोती
ये मिट्टी ही सब कुछ होती
बात नहीं ये छोटी मोटी
मिट्टी नईं बस मिट्टी होती
— Salma Malik















