हवा के साथ यारी हो गई है
दिए की उम्र लंबी हो गई है
फ़क़त ज़ंजीर बदली जा रही थी
मैं समझा था रिहाई हो गई है
बची है जो धनक उस का करूँ क्या
तिरी तस्वीर पूरी हो गई है
हमारे दरमियाँ जो उठ रही थी
वो इक दीवार पूरी हो गई है
क़रीब आ तो गया है चाँद मेरे
मगर हर चीज़ धुँदली हो गई है
— Vikas Sharma Raaz















