दग़ा हर इक की आदत है
यहाँ ये ही रिवायत है
ज़मीं पर बैठ जाता हूँ
फ़क़ीरों की सी आदत है
जो दिल से टीस उठती है
उसी में मेरी राहत है
मुझे ख़ुदस नहीं होती
तुम्हें मुझ सेे मोहब्बत है?
मैं अब ख़ामोश रहता हूँ
तुम्हें अब भी शिकायत है?
वहाँ पर एक दिन होगा
यहाँ हर दिन क़यामत है
जहाँ दिल का मुक़दमा हो
कोई ऐसी अदालत है?
ये दिल तुम तोड़ सकते हो
तुम्हें इतनी इज़ाज़त है
नहीं हटती नज़र उस से
वो इतनी ख़ूबसूरत है
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