ज़ुल्म सहते रहे शुक्र करते रहे आई लब तक न ये दास्ताँ आज तक
मुझ को हैरत रही अंजुमन में तिरी क्यूँ हैं ख़ामोश अहल-ए-ज़बाँ आज तक
मुझ को हैरत रही अंजुमन में तिरी क्यूँ हैं ख़ामोश अहल-ए-ज़बाँ आज तक
इश्क़ महव-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी हो गया हुस्न मदहोश-ए-इशवा-तराज़ी रहा
अहल-ए-दिल होश में आ चुके हैं मगर है वही आलम-ए-दिलबराँ आज तक
ऐसे गुज़रे हैं अहल-ए-नज़र राह से जिन के क़दमों से ज़र्रे मुनव्वर हुए
और ऐसे मुनव्वर जिन्हें देख कर रश्क करती रही कहकशाँ आज तक
कारवानों के रहबर ने राहज़न फिर भी मंज़िल पे कुछ राह-रौ आ गए
वो नए कारवानों के रहबर बने जिन से है अज़्मत-ए-रहबराँ आज तक
मुश्किलें आफ़तें हादसे सानेहे आए 'अख़्तर' मिरी राह में किस क़दर
मुझ को आगे बढ़ाता रहा है मगर मेरा दिल मेरा अज़्म-ए-जवाँ आज तक
Read Fullअहल-ए-दिल होश में आ चुके हैं मगर है वही आलम-ए-दिलबराँ आज तक
ऐसे गुज़रे हैं अहल-ए-नज़र राह से जिन के क़दमों से ज़र्रे मुनव्वर हुए
और ऐसे मुनव्वर जिन्हें देख कर रश्क करती रही कहकशाँ आज तक
कारवानों के रहबर ने राहज़न फिर भी मंज़िल पे कुछ राह-रौ आ गए
वो नए कारवानों के रहबर बने जिन से है अज़्मत-ए-रहबराँ आज तक
मुश्किलें आफ़तें हादसे सानेहे आए 'अख़्तर' मिरी राह में किस क़दर
मुझ को आगे बढ़ाता रहा है मगर मेरा दिल मेरा अज़्म-ए-जवाँ आज तक
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लब पे अब आरिज़-ओ-गेसू के फ़साने क्या हों
फ़ित्ना-हा-ए-सहर-ओ-शाम से जी डरता है
तुझ को मैं ढूँढ़ता फिरता हूँ दर-ओ-बाम से दूर
अब तजल्ली-ए-दर-ओ-बाम से जी डरता है
गुल खिलाए न कहीं फ़ित्ना-ए-दौराँ कुछ और
आज-कल दौर-ए-मय-ओ-जाम से जी डरता है
निगह-ए-मस्त के क़ुर्बान मिरी सम्त न देख
मौजा-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम से जी डरता है
छोड़ कर राह में बुत-ख़ाने गुज़र जाता हूँ
होश में जल्वा-ए-अस्नाम से जी डरता है
रात की ज़ुल्मतें बढ़ती ही चली जाती हैं
'अख़्तर' अपना तो सर-ए-शाम से जी डरता है
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ज़ुल्फ़ की आड़ में थी जान-ए-नज़र की सूरत
रात गुज़री तो नज़र आई सहर की सूरत
उन के लब पर है तबस्सुम मिरी आँखों में सुरूर
क्या दिखाई है दु'आओं ने असर की सूरत
क़ाफ़िले वालो नए क़ाफ़िला-सालार आए
अब बदल जाएगी अंदाज़-ए-सफ़र की सूरत
क्या करिश्मा है मिरे जज़्बा-ए-आज़ादी का
थी जो दीवार कभी अब है वो दर की सूरत
अब कोई हौसला-अफ़ज़ा-ए-हुनर है 'अख़्तर'
अब नज़र आएगी अर्बाब-ए-हुनर की सूरत
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फ़साना-ए-ख़म-ए-गेसू में कैफ़ कुछ भी नहीं
निज़ाम-ए-आलम-ए-ज़ेर-ओ-ज़बर की बात करो
चमन में दाम बिछाता है वक़्त का सय्याद
गुलों से हौसला-ए-बाल-ओ-पर की बात करो
क़बा-ए-ज़ोहद की पाकीज़गी तो देख चुके
शराब-ख़ाने में दामान-ए-तर की बात करो
कहानियाँ शब-ए-हिज्राँ की हो चुकी हैं तमाम
सहर तुलूअ'' हुई है सहर की बात करो
चमन चमन में उधर हो रही है हद-बंदी
खुली फ़ज़ाएँ जिधर हैं उधर की बात करो
गुलों का ज़िक्र बहारों में कर चुके 'अख़्तर'
अब आओ होश में बर्क़-ओ-शरर की बात करो
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यारों के इख़्लास से पहले दिल का मिरे ये हाल न था
अब वो चकनाचूर पड़ा है जिस शीशे में बाल न था
अब वो चकनाचूर पड़ा है जिस शीशे में बाल न था
इंसाँ आ कर नई डगर पर खो बैठा है होश-ओ-हवा से
पहले भी बेहोश था लेकिन ऐसा भी बद-हाल न था
गुलशन गुलशन वीरानी है जंगल जंगल सन्नाटा
हाए वो दिन जब हर मंज़िल में शोरिश-ए-ग़म का काल न था
क्यूँ रे दिवाने शहर यही है इक इक पल भारी है जहाँ
अपने वीराने में ऐ दिल जी का ये जंजाल न था
हम जो लुटे उस शहर में जा कर दुख लोगों को क्यूँ पहुँचा
अपनी नज़र थी अपना दिल था कोई पराया माल न था
तेरी ख़ाक पे रौशन रौशन 'अख़्तर' जैसे सितारे थे
तुझ सा ऐ महरान की वादी कोई बुलंद-इक़बाल न था
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सब करम है तिरे अंदाज़-ए-सितम से ऐ दोस्त
ज़ौक़-ए-ग़म दिल को न था तेरे सितम से पहले
बंदगी तेरी ख़ुदाई से बहुत है आगे
नक़्श-ए-सज्दा है तिरे नक़्श-ए-क़दम से पहले
क़ल्ब-ए-इंसाँ को है अब फिर उसी आलम की तलाश
तेरी महफ़िल थी जहाँ दैर-ओ-हरम से पहले
हम से मंसूर ज़माने में कहाँ हैं 'अख़्तर'
दार तक आ नहीं सकता कोई हम से पहले
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गुफ़्तनी बातें सही नाग़ुफ़्तनी बातें सही
चुप न बैठो कोई अफ़्साना यहाँ कहते रहो
मस्लहत क्या बात जो हक़ ही वो कह दो बरमला
लाख हों अहबाब तुम से बद-गुमाँ कहते रहो
हम कि थे आज़ाद आज़ादी की ख़ातिर मर गए
जीने वालो तुम क़फ़स को आशियाँ कहते रहो
सिर्फ़ कहने से ज़मीं क्या आसमाँ हो जाएगी
कुछ नहीं होगा ज़मीं को आसमाँ कहते रहो
राह क्या मंज़िल है कैसी हर हक़ीक़त है फ़रेब
कारवाँ को भी ग़ुबार-ए-कारवाँ कहते रहो
क्यूँ करो 'अख़्तर' की बातें वो तो इक दीवाना है
तुम तो यारो अपनी अपनी दास्ताँ कहते रहो
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शाइरो हद्द-ए-क़दामत से निकल कर देखो
दास्तानों के अब उनवान बदल कर देखो
दास्तानों के अब उनवान बदल कर देखो
क्यूँ हो तक़लीद-ए-कलीम आज भी ऐ दीदा-वरो
दीदनी हो कोई जल्वा तो सँभल कर देखो
शम-ओ-परवाना का अंदाज़ नया है कि नहीं
ज़िक्र था जिस का अब उस बज़्म में चल कर देखो
और भी रुख़ नज़र आएँगे तजल्ली के अभी
रुख़ निगाहों के ज़रा और बदल कर देखो
अगले वक़्तों के फ़साने न सुनाओ यारो
नए माहौल के साँचे में भी ढल कर देखो
कल के अंदाज़ भी दिलकश थे ये तस्लीम मगर
आज भी शहर-ए-निगाराँ में निकल कर देखो
अपने अहबाब की जानिब न उठाओ नज़रें
देखना है अगर 'अख़्तर' तो सँभल कर देखो
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शफ़क़ का रंग गहरा कर गए और
जो शो'ले मेरे काशाने से निकले
ज़रा ऐ गर्दिश-ए-दौराँ ठहरना
वो निकले रिंद मयख़ाने से निकले
ग़म-ए-दिल का असर हर बज़्म में है
सब अफ़्साने उस अफ़्साने से निकले
किया आबाद वीराने को हम ने
हमीं आबाद वीराने से निकले
जो पहुँचे दार तक मंसूर थे वो
हज़ारों रिंद मयख़ाने से निकले
निकलते हम न ग़म-ख़ाने से 'अख़्तर'
हसीं मौसम के बहकाने से निकले
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तलब में सिद्क़ है तो एक दिन मंज़िल पे पहुँचोगे
क़दम आगे बढ़ाओ ख़ुद को अपना रहनुमा समझो
ये क्या अंदाज़ है इतना गुरेज़ अहल-ए-तमन्ना से
ख़ुदा तौफ़ीक़ दे तो अहल-ए-दिल का मुद्दआ' समझो
तुम्हारे हर इशारे पर सर-ए-तस्लीम ख़म लेकिन
गुज़ारिश है कि जज़्बात-ए-मोहब्बत को ज़रा समझो
हो कोई मौज-ए-तूफ़ाँ या हवा-ए-तुंद का झोंका
जो पहुँचा दे लब-ए-साहिल उसी को नाख़ुदा समझो
जिसे देखो वही बदमस्त ही मग़रूर है हमदम
कोई बंदा नहीं दुनिया में किस किस को ख़ुदा समझो
यहाँ रहबर के पर्दे में बहुत रहज़न हैं ऐ 'अख़्तर'
रहो दूर उस से तुम जिस को वफ़ा ना-आश्ना समझो
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