शहर के शहर ही बेहोश पड़े पूछते हैं
ज़िंदगी अपने अमल-दारों से नालाँ क्यूँ है
आइना अक्स मोअ'त्तल तो नहीं करता कभी
इतना बे-आब मगर आईना-ए-जाँ क्यूँ है
फिर से मतलूब-ए-ख़लाइक़ है गवाही कोई
बर-सर-ए-कोह-ए-सियह शोला-ए-लरज़ाँ क्यूँ है
ये अमल है ख़स-ओ-ख़ाशाक की छिदराई का
रंग-ए-रंगीन-ए-गुल-ओ-लाला परेशाँ क्यूँ है
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उजड-पने में तलब कर गए जवाज़-ए-ख़ता
ख़िज़र के साथ भी हम तो निबाह कर न सके
दयार-ए-हिज्र बसाया है जो कि बरसों में
दम-ए-विसाल की ख़ातिर तबाह कर न सके
अमाँ तलब न हुए दश्त-ए-बे-पनाह में हम
सवाद-ए-जाँ भी मगर हर्फ़-ए-राह कर न सके
सफ़र-मआब यही बहर-ओ-बर है फिर भी हम
परों को अपने कुशा ख़्वाह-म-ख़्वाह कर न सके
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सारा दिन बे-कार बैठे शाम को घर आ गए
ख़्वाब में चलने लगे दीवार से टकरा गए
ख़्वाब में चलने लगे दीवार से टकरा गए
मैं भरी सड़कों पे भी बे-चाप चलने लग गया
घर में सोए लोग मेरे ज़ेहन पर यूँ छा गए
मेरा बेटा मेरे दुश्मन की ही तस्वीरें बनाए
मेरे अब्बा उस की कापी देख कर घबरा गए
जब भी सूरज डूबते देखा मैं ख़ुश होने लगा
पर कई मनहूस चमगादड़ मुझे लर्ज़ा गए
आसमाँ की सम्त देखा बादलों के वास्ते
देखते ही देखते चीलों के दिल मंडला गए
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देखने में लगती थी भीगती सिमटती रात
फैलती गई लेकिन बूँद बूँद बटती रात
फैलती गई लेकिन बूँद बूँद बटती रात
तितलियाँ पकड़ने का आ गया ज़माना याद
तेज़ तेज़ बढ़ते हम दूर दूर हटती रात
क्यूँ पहाड़ जैसा दिन ख़ाक में मिला डाला
पहले सोच लेते तो गर्द में न अटती रात
प्यार से किया रुख़्सत एक इक सितारे को
छा रही फिर आँखों में आसमाँ से छटती रात
इक सदा की सूरत हम इस हवा में ज़िंदा हैं
हम जो रौशनी होते हम पे भी झपटती रात
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शुआएँ ऐसे मिरे जिस्म से गुज़रती गईं
लहू में जैसे मिरे किर्चियाँ उतरती गईं
लहू में जैसे मिरे किर्चियाँ उतरती गईं
न जाने चेहरे हूँ आइंदा नस्ल के कैसे
बस एक ख़ौफ़ से मेरी रगें सिकुड़ती गईं
मुझे तो लगते हैं नाख़ुन भी अपने ज़हर बुझे
मेरे लिए तो मिरी उँगलियाँ भी मरती गईं
जज़ीरे कितने गराँ पानियों की गोद में हैं
पनाह के लिए सोचें मिरी बिखरती गईं
ये गर्दिशों का तवाज़ुन बिगड़ न जाए कहीं
इसी तरह जो ज़मीं की तहें उधड़ती गईं
ख़ला हयात के इम्काँ से तो नहीं आरी
प जुस्तुजूएँ कुछ अपनी ही माँद पड़ती गईं
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जो देखा अर्श-ए-तसव्वुर से बारहा सोचा
ये काएनात भी अक्स-ए-रवाँ है या कुछ और
मैं खोए जाता हूँ तन्हाइयों की वुसअत में
दर-ए-ख़याल दर-ए-ला-मकाँ है या कुछ और
फ़िराक़-ए-उम्र की हद क्यूँ लगाई है उस ने
मिरा वजूद ही उस को गिराँ है या कुछ और
अज़ल से ता-ब-अबद जस्त एक साअत की
यही बस अर्सा-ए-कार-ए-जहाँ है या कुछ और
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ये मरकज़े की हरारत कशिश का बाइ'से है
जो हो वो सर्द तो फिर ये ज़मीं भी माँ तो नहीं
मुहीत चारों-तरफ़ से है इक ख़ला-ए-बसीत
ज़मीं ये अपनी फ़क़त ज़ेर-ए-आसमाँ तो नहीं
हवा उड़ाए उन्हें और कहीं भी ले जाए
ये टीले रेत के पक्की निशानियाँ तो नहीं
हवा के पास अमानत हैं सब सदा-ओ-अक्स
अभी गिरफ़्त से बाहर हैं पर निहाँ तो नहीं
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सितारे सम्त-नुमा हैं तो इक्तिफ़ा कैसी
ज़मीन पर भी कहीं जुगनुओं का परचम हो
वो वक़्त पेट पे पत्थर ही बाँधने का है
कि जब ज़मीन पे ही ख़ंदक़ों का मौसम हो
वही तो वक़्त मुनासिब है मो'जिज़े के लिए
कुछ और आतिश-ए-क़हत-ओ-मुहाल बरहम हो
तलाश करते हुए आएँगे हरारत-ओ-नूर
अभी न शो'ला-ए-बा'स-ए-नवाज़ मद्धम हो
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अपने नाख़ुन अपने चेहरे पर ख़राशें दे गए
घर के दरवाज़े पे कुछ भूके सदाएँ दे गए
घर के दरवाज़े पे कुछ भूके सदाएँ दे गए
जागते लोगों ने शब-मारों की जब चलने न दी
दिन चढ़े वो रौशनी को बद-दुआएँ दे गए
ख़ुद ही अपने हाथ काटे और आँखें फोड़ लीं
देवताओं को पुजारी किया सज़ाएँ दे गए
एक अपनी ज़ात के नुक़्ते को मरकज़ मान कर
हौसलों के ज़ाविए बेहद ख़लाएँ दे गए
तेज़ तूफ़ानों ने साहिल रौंद डाले थे मगर
जब वो टकराए पहाड़ों से घटाएँ दे गए
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