क़याम-ओ-नक़्ल अजाइब के तर्जुमाँ तो नहीं
अमल हर एक मुसलसल है ना-गहाँ तो नहीं
ये मरकज़े की हरारत कशिश का बाइ'से है
जो हो वो सर्द तो फिर ये ज़मीं भी माँ तो नहीं
मुहीत चारों-तरफ़ से है इक ख़ला-ए-बसीत
ज़मीं ये अपनी फ़क़त ज़ेर-ए-आसमाँ तो नहीं
हवा उड़ाए उन्हें और कहीं भी ले जाए
ये टीले रेत के पक्की निशानियाँ तो नहीं
हवा के पास अमानत हैं सब सदा-ओ-अक्स
अभी गिरफ़्त से बाहर हैं पर निहाँ तो नहीं
— Ali Akbar Abbas















