"नज़्म क्या है"
    शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल
    उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल
    नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी
    ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी
    नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ
    और आज़ाद में भी है इस का निशाँ
    नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़
    इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़
    नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है
    वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है
    वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए
    नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे
    वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो
    इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो
    मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया
    नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता
    नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का
    एक दरिया सा है देखो जज़्बात का
    वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई
    ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की
    वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो
    दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो
    'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह
    हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह
    नज़्म में जो कहानी कही जाएगी
    शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी
    नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं
    जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं
    करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ
    नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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    गाँव में शे'र का इक शिकारी भी था
    खाता था दश्त की वो हमेशा हवा
    शे'र को उस ने क़ब्ज़े में इक दिन किया
    शाम होती गई बढ़ गया धुँदलका
    बकरियों को भी वो पालता था सदा
    घास भी दश्त से साथ वो लाता था
    घास और बकरी भी उस के हमराह थे
    शे'र के साथ देखो ये दोनों चले
    राह में उन की पुल एक हाइल हुआ
    धुँदलका गहरा होने लगा शाम का
    पुल के रखवाले ने उस को रोका कहा
    पार तुम पुल को कर सकते हो बरमला
    सिर्फ़ इक चीज़ को साथ ले जाओगे
    अपनी मंज़िल को फिर देख लो पाओगे
    तुम जो चाहो तो वापस भी आ सकते हो
    एक शय साथ अपने भी ला सकते हो
    सोच में पड़ गया अब शिकारी बहुत
    शर्त थी वाक़ई आज भारी बहुत
    घास को साथ ले जाना मुश्किल ही था
    क्यूँ कि ख़ुद शे'र बकरी को खा जाएगा
    हाँ अगर शे'र को साथ ले जाऊँगा
    बकरी चारा बना डालेगी घास का
    कश्मकश में शिकारी अभी पड़ गया
    कैसे हल होगा है ये बड़ा मसअला
    अब उसे कुछ समझ में तो आया नहीं
    सोचते सोचते झुक गई थी जबीं
    एक तरकीब आख़िर को सूझी उसे
    पुल से गुज़रा वो अब बच्चो बकरी लिए
    पार बकरी ने ऐ बच्चो पुल जो किया
    घास को शे'र बस सूँघ कर रह गया
    आया वापस पलट कर शिकारी अभी
    उस की आँखों में बच्चो चमक जाग उठी
    इस तरफ़ शे'र और उस तरफ़ बकरी थी
    घास ले जाने की बारी अब आ गई
    घास का गट्ठा साथ अपने वो ले गया
    शे'र बस मुँह शिकारी का तकता रहा
    घास को बकरी के पास उस ने रक्खा
    और बकरी को ख़ुद उस ने वापस लिया
    इस तरफ़ घास का सिर्फ़ गठा रहा
    क्यूँ कि ख़तरा मिलन शे'र ओ बकरी का था
    इस लिए शे'र को साथ ले कर चला
    शे'र को घास के पास छोड़ा गया
    सोचिए घास को शे'र खाएगा क्या
    घास को शे'र बस सूँघ कर रह गया
    अब शिकारी चला बकरी लाने को साथ
    अब के बकरी की रस्सी पे था उस का हाथ
    अब वो बकरी के हमराह आ ही गया
    शे'र दिल में ही ख़ुद ग़ुर्राता रहा
    एक जानिब थी बकरी तो इक सम्त शे'र
    की नहीं अब शिकारी ने जाने में देर
    घास का गठा सर पर शिकारी के था
    गाँव का अपने अब उस ने रस्ता लिया
    यूँ शिकारी ने गुत्थी को सुलझा लिया
    उन के जाने का भी मसअला हल हुआ
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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    गर्मी का जो मौसम आया
    जलने लगी पेड़ों की छाया
    सूख गई थी डाली डाली
    और पत्तों से भी थी ख़ाली
    नंगे पेड़ पे बैठा कव्वा
    हाँप रहा था जो प्यासा था
    पानी को वो ढूँढ़ता निकला
    घर के इक छज्जे पर बैठा
    हर सू काल था पानी का जो
    गाँव में भी था सूखा प्यारो
    आँगन में थी एक सुराही
    उस में था थोड़ा सा पानी
    कव्वा सुराही तक जा पहुँचा
    लेकिन पानी तह में ही था
    चोंच को अपनी अंदर डाला
    पानी तक वो पहुँच न पाया
    हो गया देख के ये ख़ुश कव्वा
    बाज़ू ढेर था कंकरियों का
    लाया इक इक को ये चुन कर
    डालता जाता था यूँ कंकर
    उस में डाले इतने कंकर
    पानी उभर कर आया ऊपर
    फिर कव्वे ने प्यास बुझाई
    उस की जान में जान अब आई
    उड़ गया फुरती से अब कव्वा
    चुनने लगा फिर दाना दुन्का
    अक़्ल का खोलो तुम दरवाज़ा
    हल मुश्किल का ख़ुद निकलेगा
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    देखो अपनी आँख-मिचौली एक हक़ीक़त हो गई ना
    तुम से मुझ को मुझ से तुम को आज मोहब्बत हो गई ना

    मैं ने कहा था धूप में मेरे साथ न तुम चल पाओगे
    मैली मैली तुम्हारी उजली चाँद सी सूरत हो गई ना

    महफ़िल में हँसते हैं लेकिन तन्हाई में रोते हैं
    एक सी मेरी और तुम्हारी अब ये हालत हो गई ना

    दोज़ख़ में पहुँचाए बड़ों को उन के दिखावे के सज्दे
    बच्चों को माँ की ख़िदमत से हासिल जन्नत हो गई ना

    दीद का मैं भूका हूँ 'हाफ़िज़' उस का रुख़ है इक लुक़्मा
    उस को देखा तो पूरी आँखों की ज़रूरत हो गई ना
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    दिल में धड़कन लब में जुम्बिश चाहिए
    ज़िंदा रहने को ये वर्ज़िश चाहिए

    आदमी होने का देने को सुबूत
    पाँव में थोड़ी सी लग़्ज़िश चाहिए

    बैठे बैठे क़िस्मतें बनती नहीं
    अज़्म मेहनत और कोशिश चाहिए

    इम्तिज़ाज-ए-ऐश-ओ-ग़म है ज़िंदगी
    लाख ख़ुशियाँ भी हों रंजिश चाहिए

    'हाफ़िज़' उस को जुस्तुजू सूरज की है
    और तुम्हें भी एक महविश चाहिए
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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    दूर के ढोल सुहाने हैं
    सदियों के अफ़्साने हैं

    शम-ए-मोहब्बत जल के समझ
    हम तेरे परवाने हैं

    दिल में उतर कर देखो ज़रा
    चाहत के तह-ख़ाने हैं

    माँग रहे हैं तुझ से वफ़ा
    हम भी क्या दीवाने हैं

    यारों की बद निय्यत से
    शर्मिंदा याराने हैं

    'हाफ़िज़' अब टुकड़े टुकड़े
    ज़ेहन के ताने-बाने हैं
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    हम ने सीखा है मोहब्बत करना
    एक इक दिल पे हुकूमत करना

    हम भी तारीख़ बदल सकते हैं
    शर्त है हिम्मत-ओ-जुरअत करना

    ज़ेब देता नहीं इंसानों को
    किसी इंसाँ की इबादत करना

    रख के ख़ुद अपनी ज़रूरत को उधार
    पूरी औरों की ज़रूरत करना

    शब की तारीकी में सीखा हम ने
    चाँद तारों की तिलावत करना

    आख़िरी साँस तलक जीवन की
    मर्द की शान है मेहनत करना

    फ़र्ज़ से हज के है अफ़ज़ल 'हाफ़िज़'
    बूढे माँ-बाप की ख़िदमत करना
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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    घर आँगन में फैली धूप
    पीले रंग में लिपटी धूप

    रोज़ किताबें चूमती है
    सुब्ह की उजली उजली धूप

    हम जब भी स्कूल गए
    हम से पहले वहाँ थी धूप

    हम न रुकेंगे मंज़िल तक
    कैसी बारिश कैसी धूप

    धरती सोना लगती है
    चमकाए यूँ मिट्टी धूप

    ढूँडा था हम ने तो क़लम
    बस्ते में से निकली धूप

    किरनों की छतरी था
    में
    'हाफ़िज़' छत पर उतरी धूप
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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    ये महकते हुए जज़्बात ये अश'आर के फूल
    काश काम आएँ किसी के मिरे अफ़्कार के फूल

    मेरे दिल ने जो सजा रक्खे हैं ज़ख़्मों की तरह
    खिल न पाए किसी गुलशन में वो मेआ'र के फूल

    सूँघती हैं उन्हें ख़ुश हो के बहिश्ती हूरें
    सरफ़रोशों के बदन पर हैं जो तलवार के फूल

    ये मिरे अश्क-ए-नदामत हैं ख़ुदा को महबूब
    दुनिया वालों की निगाहों में हैं बे-कार के फूल

    मुझ को तोहफ़े में अता उस ने किए हैं 'हाफ़िज़'
    कभी इनकार के काँटे कभी इक़रार के फूल
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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    मिरी वफ़ा की वो पहचान भी नहीं रखते
    सिला तो दूर है एहसान भी नहीं रखते

    वो बरकतों के फ़रिश्तों के इंतिज़ार में हैं
    घरों में अपने जो क़ुरआन भी नहीं रखते

    जिन्हें ख़ुलूस की ख़ुशबू अज़ीज़ होती है
    वो अपनी मेज़ पे गुल-दान भी नहीं रखते

    वो हादसों से डराते हैं अपने बच्चों को
    दियों के सामने तूफ़ान भी नहीं रखते

    बड़े अजीब मुसाफ़िर हैं हम भी ऐ 'हाफ़िज़'
    सफ़र पे निकले हैं सामान भी नहीं रखते
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    Amjad Husain Hafiz Karnataki
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