मिरी वफ़ा की वो पहचान भी नहीं रखते
सिला तो दूर है एहसान भी नहीं रखते
वो बरकतों के फ़रिश्तों के इंतिज़ार में हैं
घरों में अपने जो क़ुरआन भी नहीं रखते
जिन्हें ख़ुलूस की ख़ुशबू अज़ीज़ होती है
वो अपनी मेज़ पे गुल-दान भी नहीं रखते
वो हादसों से डराते हैं अपने बच्चों को
दियों के सामने तूफ़ान भी नहीं रखते
बड़े अजीब मुसाफ़िर हैं हम भी ऐ 'हाफ़िज़'
सफ़र पे निकले हैं सामान भी नहीं रखते
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