ये महकते हुए जज़्बात ये अश'आर के फूल
काश काम आएँ किसी के मिरे अफ़्कार के फूल
मेरे दिल ने जो सजा रक्खे हैं ज़ख़्मों की तरह
खिल न पाए किसी गुलशन में वो मेआ'र के फूल
सूँघती हैं उन्हें ख़ुश हो के बहिश्ती हूरें
सरफ़रोशों के बदन पर हैं जो तलवार के फूल
ये मिरे अश्क-ए-नदामत हैं ख़ुदा को महबूब
दुनिया वालों की निगाहों में हैं बे-कार के फूल
मुझ को तोहफ़े में अता उस ने किए हैं 'हाफ़िज़'
कभी इंकार के काँटे कभी इक़रार के फूल
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