Daniyal Tareer

Top 10 of Daniyal Tareer

    हवा ने साँस लिया था
    अभी कहानी में
    फ़लक की आँख में शो'ले
    अभी दहकते थे
    थकन की गोंद ने चिपका रखे थे
    जिस्म से पर
    शफ़क़ के लोथड़े बिखरे हुए थे
    पानी में
    नमाज़-ए-अस्र अदा होनी थी
    हुई कि नहीं
    परिंद झील पर उतरे
    मगर वज़ू न किया
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    Daniyal Tareer
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    वक़्त और ना-वक़्त के मा-बैन
    कितना फ़ासला
    कितना ख़ला
    कितनी घनेरी ख़ामुशी है
    जानने की कोशिशों में
    आँख की और दिल की उजली आँख की
    बीनाइयाँ कम पड़ गई हैं
    सोचता हूँ
    सोच का कोई परिंदा भेज कर
    इस हद्द-ए-ला-हद का
    कोई अंदाज़ा कर लूँ

    ख़ुद से कहता हूँ
    तुझे मालूम है
    ये काम सोचों के परिंदों का नहीं
    तख़्ईल का है
    जो परिंदा ग़ैब की इस झील का है
    जिस में सब ना-दीदगाँ के
    अक्स बनते रक़्स करते हैं
    इन्ही ना-दीदगाँ में
    वक़्त और ना-वक़्त के मा-बैन का
    वो फ़ासला और वो ख़ला और वो घनेरी ख़ामुशी
    भी हो तो क्या मालूम
    बहते अक्स उन के ताइर-ए-तख़्ईल के शहपर से लिपटे साथ आ जाएँ
    ये गहरे भेद मेरे हाथ आ जाएँ
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    Daniyal Tareer
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    हमारे ग़म जुदा थे
    क़र्या-ए-दिल की फ़ज़ा आब ओ हवा
    मौसम जुदा थे
    शाम तेरे जिस्म की दीवार से चिमटी हुई थी
    मुझ को काली रात खाती थी
    तुझे आवाज़ देती थी तिरे अंदर से उठती हूक
    मुझ को भूक मेरी रूह से बाहर बुलाती थी
    तुझे पाँव में पड़ती बेड़ियों का रोग लाहक़ था
    मुझे आज़ादी पे शक था
    तुझे अपनों ने अपने घेर का क़ैदी बनाया था
    मुझे बे-रिश्तगी ने ज़ात का भेदी बनाया था
    मुसलसल लीख पर गर्दिश में रहना नाचना
    तेरा वतीरा था
    मिरी इक अपनी दुनिया थी
    मिरा अपना जज़ीरा था
    कोई दरिया था अपने बीच
    हम दोनों किनारे थे
    अलग दो कहकशाएँ थीं
    जहाँ के हम सितारे थे
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    Daniyal Tareer
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    नहीं मैं नहीं हूँ
    किसी दूसरे ने मुझे ''मैं'' कहा है
    तो में हो गया हूँ
    नफ़स खींचता हूँ
    मगर ज़िंदगी मेरी ख़्वाहिश नहीं है
    मुझे ज़िंदगी ने चुना है
    लिहाज़ा मिरे फ़ैसले ज़िंदगी कर रही
    मैं रोता नहीं हूँ
    मिरी आँख से ओस के फूल
    ग़म की हवाएँ गिराती हैं
    कलियाँ हँसी की
    मिरे लब पे खिलती नहीं हैं
    ख़ुशी की बहारें खिलाती हैं
    ख़ुद आती जाती हैं दिल में तमन्नाएँ
    मैं कब बुलाता हूँ
    (मेरी कमाई
    फ़क़त ना-रसाई है)
    मैं ने मोहब्बत भी कब मुंतख़ब की है
    उस ने मुझे अपनी फ़हरिस्त में लिख लिया है
    मुझे ख़्वाब आते नहीं हैं
    सो ख़्वाबों ने तय कर लिया है
    कि आइंदा वो मेरी आँखों के बोसों से
    कोसों के लम्बे सफ़र पर चलेंगे

    नहीं मैं कवी भी नहीं हूँ
    मुझे नज़्म लिखती है
    मैं नज़्म लिखता नहीं हूँ
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    Daniyal Tareer
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    नज़्म कहोगे
    कह लोगे क्या?
    देखो इतना सहल नहीं है
    बनती बात बिगड़ जाती है
    अक्सर नज़्म अकड़ जाती है

    चलते चलते
    ला को मरकज़ मान के
    घूमने लग जाती है

    लड़ते लड़ते
    लफ़्ज़ों के हाथों को
    चूमने लग जाती है

    सीधे रस्ते पर मुड़ती है
    मोड़ पे सीधा चल पड़ती है

    हर्फ़ को बर्फ़ बना देती है
    बर्फ़ में आग लगा देती है

    चुप का क़ुफ़्ल लगा कर गूँगी हो जाती है
    धीमा धीमा बोलते यक-दम ग़ुर्राती है

    नज़्म कहोगे
    कह लोगे क्या
    देखो इतनी सहल नहीं है
    बनती बात बिगड़ जाती है
    राह में साँस उखड़ जाती है
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    Daniyal Tareer
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    मिट्टी था और दूध में गूँधा गया मुझे
    इक चाँद के वजूद में गूँधा गया मुझे

    मैं नीस्त और नबूद की इक कैफ़ियत में था
    जब वहम-ए-हस्त-ओ-बूद में गूँधा गया मुझे

    मैं चश्म-ए-कम-रसा से जिसे देखता न था
    उस ख़्वाब-ए-ला-हुदूद में गूँधा गया मुझे

    ख़स-ख़ाना-ए-ज़ियाँ की शररबारियों के बा'द
    यख़-ज़ार-ए-नार-ए-सूद में गूँधा गया मुझे

    इक दस्त-ए-ग़ैब ने मुझे ला चाक पर धरा
    फिर वक़्त के जुमूद में गूँधा गया मुझे

    इस में तो आसमाँ के शजर भी समर न दें
    जिस ख़ाक-ए-बे-नुमूद में गूँधा गया मुझे

    क़ौस-ए-क़ुज़ह की सम्त बहुत देखता था मैं
    आख़िर गुबार-ओ-दूद में गूँधा गया मुझे
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    ख़्वाब-कारी वही कमख़्वाब वही है कि नहीं
    शे'र का हुस्न अबद-ताब वही है कि नहीं

    क्या परी को मुझे मछली में बदलना होगा
    देखने के लिए तालाब वही है कि नहीं

    मैं जहाँ आया था पेड़ों की तिलावत करने
    सामने क़र्या-ए-शादाब वही है कि नहीं

    आँख को नींद में मा'लूम नहीं हो सकता
    रात वो है कि नहीं ख़्वाब वही है कि नहीं

    जिस को छूने से मिरा जिस्म चमक उट्ठेगा
    देख ये शीशा-ए-महताब वही है कि नहीं

    ये कहानी के अलाव से चुराई हुई आग
    महव-ए-हैरत है कि बर्फ़ाब वही है कि नहीं

    सर झुकाने से जहाँ अश्क-ए-तपाँ जागा था
    सोचता हूँ कि ये मेहराब वही है कि नहीं
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    रेत मुट्ठी में भरी पानी से आग़ाज़ किया
    सख़्त मुश्किल में था आसानी से आग़ाज़ किया

    मुझ को मिट्टी से बदन बनते हुए उम्र लगी
    मेरी ता'मीर ने वीरानी से आग़ाज़ किया

    ये जहानों का ज़मानों का मकानों का सफ़र
    ग़ैब ने लफ़्ज़ से या मा'नी से आग़ाज़ किया

    जब भी ये आँख अनासिर की तरफ़ देखती है
    याद आता है परेशानी से आग़ाज़ किया

    जिस्म और इस्म मुझे कैसे मिले किस ने दिए
    इन सवालात की हैरानी से आग़ाज़ किया

    एक ख़ामोश समुंदर था मिरे चार तरफ़
    जिस में आवाज़ ने तुग़्यानी से आग़ाज़ किया

    मुझ को बद-सूरती-ए-जिस्म का अंदाज़ा है
    मैं ने आईना-ए-उर्यानी से आग़ाज़ किया
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    Daniyal Tareer
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    नई नई सूरतें बदन पर उजालता हूँ
    लहू से कैसे अजीब मंज़र निकालता हूँ

    वो दिल में उतरें तो एक हो जाएँ रौशनी दें
    धनक के रंगों को अपनी आँखों में डालता हूँ

    ज़मीन तलवों से आ चिमटती है आग बन कर
    हथेलियों पर जब आसमाँ को सँभालता हूँ

    हवा में थोड़ा सा रंग उतरे सो इस लिए मैं
    गुलाब की पत्तियाँ फ़ज़ा में उछालता हूँ

    कोई नहीं था जो इस मुसलसल सदा को सुनता
    ये मैं हूँ जो इस दिए को सूरज में ढालता हूँ

    'तरीर' साँसों का रंग नीला हुआ तो जाना
    ख़बर नहीं थी ये साँप हैं जिन को पालता हूँ
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    Daniyal Tareer
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