Jagdish Prakash

Top 10 of Jagdish Prakash

    हम ने भी चाहा था बहुत कुछ
    हम ने भी कुछ माँगा था
    जो भी चाहो सब मिल जाए
    ऐसा तो दस्तूर नहीं
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    Jagdish Prakash
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    तन्हाई को ख़्वाब की दस्तक देते देखा
    देखा इक गुम्बद के नीचे
    खड़ा हुआ हूँ
    सुनता हूँ ख़ुद की आवाज़ें
    ये आवाज़ें
    मुझ को वापस ले जाती हैं
    ख़्वाबों के उस मुर्दा-घर में
    जो बिल्कुल तारीक पड़ा है
    जिस में मेरे माज़ी के किरदारों के
    कुछ कफ़न पड़े हैं
    उन लोगों के
    जो ज़ीनत थे इन ख़्वाबों की
    लेकिन उन किरदारों की अब शक्ल नहीं है
    इक तारीकी है बदबू है ख़ामोशी है
    मुर्दा-घर के पर्दों से
    मेरी आवाज़ें झूल रही हैं
    जिन से इक चमगादड़ का नन्हा सा बच्चा
    खेल रहा है
    सड़कों पर कोहराम मचा है
    कुछ तो हुआ है
    लोग मरे हैं
    लहू बहा है
    और ये चमगादड़ का बच्चा
    मेरी तन्हाई का वारिस
    मेरी आवाज़ों की लर्ज़ां उँगली था
    में
    मुझ को उस मंज़र की जानिब खींच रहा है
    जहाँ किसी नन्हे बच्चे की
    लाश पड़ी है
    और वो चमगादड़ का बच्चा
    मेरे ज़ह्न की सूखी परतों में
    एहसास का रेशा ढूँड रहा है
    और इस ठंडी लाश पे बैठा
    सिसक रहा है
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    Jagdish Prakash
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    मैं तो इक वजूद-ए-ख़याल हूँ
    मुझे जिस तरह से भी सोच लो
    मैं यक़ीं भी हूँ मैं गुमाँ भी हूँ
    मैं यहाँ भी हूँ मैं वहाँ भी हूँ
    कभी फ़िक्र में कभी ज़िक्र में
    कभी जोश में कभी होश में
    कभी ख़ुद से ख़ुद की तलाश में
    कभी मैं नहीं कभी जाँ नहीं
    कि मैं मुब्तला-ए-जुनून हूँ
    मैं ख़ुदी में ख़ुद का सुकून हूँ
    यही इश्क़ है मिरा कारवाँ
    मैं किधर नहीं मैं कहाँ नहीं
    मिरा यार मुझ में मैं यार में
    मैं हूँ बे-ख़ुदी के ख़ुमार में
    मिरा यार मुझ में है रक़्स-ज़न
    मैं रवाँ रवाँ भी रवाँ नहीं
    मिरी राहतों में तू जल्वा-गर
    मिरी वहशतों का तू हम-सफ़र
    मिरा हिज्र तू मिरा वस्ल तू
    मिरे घर का एक पता है बस
    जहाँ तू नहीं मैं वहाँ नहीं
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    Jagdish Prakash
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    बात की बात रहे बात का मफ़्हूम रहे
    और तख़य्युल मिरा ताज़ा रहे मा'सूम रहे

    हर नई सोच को मज़मून बना लूँगा मगर
    मेरा किरदार मिरी ज़ात से मौसूम रहे

    मेरी पहचान के सब लोग जुदा होते गए
    जो बचे मेरी तरह बेबस-ओ-मज़लूम रहे

    आज तक बनते रहे हैं जो हमारे ज़ामिन
    उन से हम हाथ मिलाने से भी महरूम रहे

    अब तो बस ख़ुद ही सुना करते हैं अपनी आवाज़
    आप के क़दमों की आहट से भी महरूम रहे
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    Jagdish Prakash
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    तिरा ख़याल मुझे इस तरह पुकारता है
    कि मंदिरों में कोई आरती उतारता है

    हिलोरें लेती है कुछ इस तरह तिरी यादें
    नदी में जैसे कोई कश्तियाँ उतारता है

    ख़मोशियों के बिछौने पे शब के पिछले पहर
    तिरा ख़याल नई आरज़ू उभारता है

    तिरी वफ़ाओं के मौसम बदलते रहते हैं
    मिरी वफ़ा का चमन बस तुझे निहारता है

    कुछ आहटें सी कहीं हो रही हैं दिल के क़रीब
    कोई तो है जो मिरी बज़्म-ए-जाँ सँवारता है

    मुझे तो अपने अक़ीदों की पुख़्तगी है अज़ीज़
    नहीं ये ख़ौफ़ कोई सर मिरा उतारता है
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    Jagdish Prakash
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    मिरा वजूद मिरे ए'तिबार जैसा है
    कभी विसाल कभी इंतिज़ार जैसा है

    मुझे तो उस की मसीहाई पर था नाज़ बहुत
    मगर वो ख़ुद ही बड़ा बे-क़रार जैसा है

    मिरे ज़मीर पे है बोझ मेरे माज़ी का
    जो मेरी ज़ात पे अब तक उधार जैसा है

    अजीब एक मुअ'म्मा है इश्क़ भी 'जगदीश'
    कभी ये जीत कभी सिर्फ़ हार जैसा है

    यहाँ न कोई इरादा न आरज़ूएँ हैं
    मिरा जुनूँ मिरे दिल के ग़ुबार जैसा है
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    Jagdish Prakash
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    मैं ने साँसों से गुफ़्तुगू की है
    साथ चलने की आरज़ू की है

    गुम-शुदा वक़्त के मुसाफ़िर को
    फिर से पाने की जुस्तुजू की है

    ज़ंग-ख़ुर्दा हयात का क्या ज़िक्र
    बात लम्हों की आबरू की है

    ख़ुद में ख़ुद को तलाश करने की
    मैं ने कोशिश चहार-सू की है
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    Jagdish Prakash
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    इक पुरानी शराब जैसा इश्क़
    मुझ से ख़ाना-ख़राब जैसा इश्क़

    'मीर' की एक ग़ज़ल सा दिल-अफ़रोज़
    इक मुक़द्दस किताब जैसा इश्क़

    है गुनह भी यही इबादत भी
    आक़िबत के हिसाब जैसा इश्क़

    कभी सहरा कभी समुंदर है
    कभी गंगा के आब जैसा इश्क़

    सौ दु'आओं का मुस्तक़िल एहसास
    बंदगी के सवाब जैसा इश्क़

    आब-ए-ज़म-ज़म है इस को पी लीजे
    है मुक़द्दस शराब जैसा इश्क़

    मुख़्तसर बहर की है मेरी ग़ज़ल
    इस ग़ज़ल के जवाब जैसा इश्क़

    किसी मा'शूक़ के बदन की महक
    एक ताज़ा गुलाब जैसा इश्क़
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    Jagdish Prakash
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    बसारत खो गई है रौशनी में
    मज़ा आने लगा है तीरगी में

    सराबों से सराबों के सफ़र तक
    तड़प बढ़ती गई है तिश्नगी में

    ये डेरा जोगियों का है यहीं पर
    मिलेगा खो दिया जो ज़िंदगी में

    मुख़ातिब तुम से हूँ मैं कुछ तो बोलो
    कटेगी रात क्या बेचारगी में

    दुआ के बा'द पत्थर भी मिलेंगे
    यही तो लुत्फ़ है दीवानगी में

    तिरी चाहत में जो कुछ पा लिया है
    नहीं हासिल हुआ वो बंदगी में

    नहीं पहचानता मुझ को मिरा घर
    बना हूँ अजनबी आवारगी में
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    Jagdish Prakash
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    तुम्हारा ज़िक्र मिरी दास्तान बन बैठा
    मैं एक ज़र्रा था और आसमान बन बैठा

    सवाल करते हैं रह-रह के मुझ से लैल-ओ-नहार
    मैं अपनी ज़ात से क्यूँ बद-गुमान बन बैठा

    वो जिस ने मुझ को नज़र भर के भी नहीं देखा
    वो शख़्स मेरे फ़साने की जान बन बैठा

    ख़याल-ए-नौ से उलझता हुआ मिरा एहसास
    मिरी ग़ज़ल के सफ़र का बयान बन बैठा

    मैं जिस्म हूँ कि कोई रूह या फ़क़त एहसास
    मिरा वजूद ख़ुद इक इम्तिहान बन बैठा

    कभी जो उस को तसव्वुर में ला के देख लिया
    हर इक ख़याल मिरा गुल्सितान बन बैठा
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    Jagdish Prakash
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