बसारत खो गई है रौशनी में
मज़ा आने लगा है तीरगी में
सराबों से सराबों के सफ़र तक
तड़प बढ़ती गई है तिश्नगी में
ये डेरा जोगियों का है यहीं पर
मिलेगा खो दिया जो ज़िंदगी में
मुख़ातिब तुम से हूँ मैं कुछ तो बोलो
कटेगी रात क्या बेचारगी में
दुआ के बा'द पत्थर भी मिलेंगे
यही तो लुत्फ़ है दीवानगी में
तिरी चाहत में जो कुछ पा लिया है
नहीं हासिल हुआ वो बंदगी में
नहीं पहचानता मुझ को मिरा घर
बना हूँ अजनबी आवारगी में
— Jagdish Prakash















