साक़ी की बारगाह में तौबा हुई क़ुबूल
ख़ुद ढूँढ़ता हुआ मुझे मय-ख़ाना आ गया
सज्दों का मेरे नाज़ उठाने के वास्ते
का'बे के सामने दर-ए-जानाना आ गया
दामन को मेरे देख के हसरत के हाथ में
याद उन को अपना लुत्फ़-ए-करीमाना आ गया
मुझ को मिरे सवाल पे बख़्शा है दो-जहाँ
अब ए'तिबार-ए-तर्ज़-ए-फ़क़ीराना आ गया
थी शैख़-ओ-बरहमन की मय-ओ-अंगबीं पे बहस
इतने में बढ़ के 'कैफ़ी’-ए-दीवाना आ गया
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देखता हूँ शबाब को मुड़ कर
ज़िंदगानी यहाँ से गुज़री है
दिल की रूदाद कैफ़ का आलम
दास्ताँ दास्ताँ से गुज़री है
रात बे-जाम-ओ-ख़ोशा-ए-अंगूर
उफ़ नज़र कहकशाँ से गुज़री है
ज़िंदगानी-ए-काहिश-ए-उम्मीद
मेरी उम्र-ए-रवाँ से गुज़री है
ये हुआ है कि अब मिरी उम्मीद
दिल में है राह-ए-जाँ से गुज़री है
बे-ख़ुदी के करम से ऐ 'कैफ़ी'
ख़ूब पीर-ए-मुग़ाँ से गुज़री है
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कर के दिल-ए-नालाँ से मिरे साज़ किसी ने
दी है मुझे पर्दे से ये आवाज़ किसी ने
दी है मुझे पर्दे से ये आवाज़ किसी ने
इस दिल का है जो दर्द वही जान है दिल की
समझा न कभी इश्क़ का ये राज़ किसी ने
वा बाब-ए-क़फ़स और हूँ मैं बाब-ए-क़फ़स पर
जैसे कि उड़ा ली पर-ए-पर्वाज़ किसी ने
तक़दीर में जो कुछ मिरी हँसना है कि रोना
बख़्शा वही दिल को मिरे अंदाज़ किसी ने
हर अश्क का क़तरा था फ़साना मिरे दिल का
देखा न मिरा दीदा-ए-ग़म्माज़ किसी ने
दी मुझ को तड़प वो भी ब-क़द्र-ए-दिल-ए-बेताब
मैं क्या कि ये समझा न तिरा राज़ किसी ने
हर शे'र है डूबा हुआ तासीर में 'कैफ़ी'
बख़्शा है मुझे ख़ामा-ए-ए'जाज़ किसी ने
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ये दिल की बात है किस ने कही है
मोहब्बत ख़ुद सरासर आगही है
मोहब्बत ख़ुद सरासर आगही है
तुम्हीं कह दो कि मैं बिल्कुल न समझा
नज़र झेंपी हुई कुछ कह रही है
ये सर पर साया-गुस्तर ख़ाक-ए-सहरा
जुनूँ बे-ताज की शाहनशही है
वो जिस ने छीन ली है ज़िंदगानी
मताअ-ए-ज़िंदगानी भी वही है
जुनून-ए-इश्क़ ख़ुद मंज़िल है 'कैफ़ी'
ख़िरद की राह इस में गुमरही है
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आप ने फेंक दी नक़ाब गर्मी-ए-इश्क़ देख कर
हश्र-नवाज़ हुस्न आज हश्र के काम आ गया
मिल्लत-ए-कुफ़्र-ओ-दीं की बहस गर्म थी ख़ानक़ाह में
इतने में कोई मय पिए दस्त-ब-जाम आ गया
शौक़ का ए'तिबार क्या यास ये इख़्तियार क्या
राह-ए-उम्मीद-ओ-बीम में दिल का मक़ाम आ गया
दिल मिरा देखता रहा और मेरी ज़बान पर
लज़्ज़त-ए-जान-ए-आरज़ू आप का नाम आ गया
दहर जवान हो गया खुल गया मय-कदे का दर
साक़ी-ए-मस्त मस्त-ए-नाज़ मस्त-ए-ख़िराम आ गया
जल्वा-ए-बे-हिजाब को ख़ूब समझ रहा हूँ मैं
महशर-ए-दीद मुंतज़िर मंज़र-ए-आम आ गया
'कैफ़ी'-ए-बे-क़रार सुन ये रग-ए-जाँ के साज़ से
है मिरी इल्तिजा क़ुबूल दिल का पयाम आ गया
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जो हाल-ए-दिल था कैफ़ में तासीर-ए-दर्द था
वो कहते कहते शौक़ का अफ़्साना बन गया
जन्नत की आरज़ू से है जन्नत का कल वजूद
वीराना कह दिया जिसे वीराना बन गया
यक क़तरा दिल था मस्त का पैमाना-ए-नसीब
साक़ी ने की निगाह तो मय-ख़ाना बन गया
मौक़ा-शनास हुस्न-ए-मोहब्बत के बाब में
अपना था और हश्र में बेगाना बन गया
उस की तलब में जब न रहा उस का कुछ लिहाज़
अंदाज़-ए-बे-क़रार गदायाना बन गया
यूँ अपने दर से टाल दिया उस के नाज़ ने
अंदाज़-ए-लुत्फ़-ए-ख़ास करीमाना बन गया
'कैफ़ी' हरम के दर पे था जो कुछ वो फ़ैज़ था
हाँ बुत-कदे में सज्दा-ए-शुकराना बन गया
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ऐ अहल-ए-मोहब्बत क्या कहिए क्या चीज़ मोहब्बत होती है
कुछ ग़म की हक़ीक़त होती है कुछ दिल की तबीअ'त होती है
कुछ ग़म की हक़ीक़त होती है कुछ दिल की तबीअ'त होती है
कुल ज़ीस्त अलम ता-ज़ीस्त अलम यक वक़्फ़ा-ए-दम तस्कीन-ए-अलम
सुनते हैं क़यामत आती है जब उस से भी फ़ुर्सत होती है
उफ़ आयत-ए-सजदा हुस्न-ए-अदा जल्वे के लिए पर्दा भी उठा
बेताब जबीं झुक जाती है कुछ ऐसी भी सूरत होती है
कुछ मस्त निगाह-ए-साक़ी है कुल मय में है जो कुछ बाक़ी है
मय-ख़ाने के बाहर कुछ भी नहीं मय-ख़ाने में जन्नत होती है
दुनिया से अलग हो कर 'कैफ़ी' दुनिया से ख़फ़ा दुनिया का गिला
उम्मीद अगर बाक़ी न रहे तब यास में राहत होती है
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चाक सीने का ब-अंदाज़-ए-जिगर हो कि न हो
और फिर लज़्ज़त-ए-जाँ ज़ौक़-ए-असर हो कि न हो
और फिर लज़्ज़त-ए-जाँ ज़ौक़-ए-असर हो कि न हो
तुझ से ऐ शम्अ'' सर-ए-शाम ही रुख़्सत हो लूँ
शब बसर हो कि न हो वक़्त-ए-सहर हो कि न हो
उम्र-ए-नज़्ज़ारा उसी जल्वे पे क़ुर्बां कर दूँ
फिर कभी और मुझे ताब-ए-नज़र हो कि न हो
अब जहाँ वो हैं मिरा होश वहीं है ऐ दिल
बे-ख़बर मैं हूँ उन्हें इस की ख़बर हो कि न हो
अपने महशर की सहर भेज ही दे अब यारब
या'नी तन्हा है मिरी रात बसर हो कि न हो
इस क़दर पूछ तो लो रू-ए-सहरस 'कैफ़ी'
उस पे रंग-ए-असर-ए-दीदा-ए-तर हो कि न हो
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जितनी थी खटक साँस की कुल नग़्मा-ए-जाँ थी
क्या तुम ने मुझे हँस के पुकारा तो नहीं था
ता-ज़ीस्त मुझे जान-ए-हज़ीं बख़्शने वाले
इस में कोई अंदाज़ तुम्हारा तो नहीं था
रो रो के क़यामत का लिया नाम किसी ने
कोई तिरी उम्मीद का मारा तो नहीं था
टूटे हुए क्यूँ दिल को मिरे देख रहे हो
आँसू था मिरी सुब्ह का तारा तो नहीं था
मुद्दत से बड़ा नाम है फ़िरदौस का 'कैफ़ी'
गेसू को कहीं उस ने सँवारा तो नहीं था
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तार-ए-गरेबाँ सीने वाले चाक-ब-दामन आए हैं
या'नी कुछ तक़दीर न सुलझी उलझी थी दीवाने से
रात नहीं ये ज़ीस्त का दिन है होश में आ बर्बाद न कर
शम्अ''' फ़क़त मेहमान-ए-सहर है कौन कहे परवाने से
दैर-ओ-हरम से उठने वाले आए हैं मयख़ाने में
इस पे अगर तक़दीर उठा दे जाएँ कहाँ मयख़ाने से
जोश-ए-जुनूँ सा रहबर हो तो होश की मंज़िल दूर नहीं
दीवाने ने राह बना दी बस्ती तक वीराने से
साक़ी के अंदाज़ को देखो बे-ख़ुद पीने वालों में
मिलती है मय क़िस्मत से गो बटती है पैमाने से
ज़र्फ़ मिरी क़िस्मत का भरा है आप निगाह-ए-साक़ी ने
पैमाने को ख़ुम से मिली और ख़ुम को मिली पैमाने से
उम्र-ए-दो-रोज़ा 'कैफ़ी' की यूँ कट ही गई यूँ कटनी थी
काम रहा पैमाने से और साक़ी के मयख़ाने से
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